गुरुवार, 16 जुलाई 2026

ना बडा ना छोटा एक मझला बेटा

ना बड़ा, ना छोटा — एक मझला बेटा😌

मरणोपरांत माँ को एक पत्र✍

अध्याय – 1

माँ, तुम्हारे जाने के बाद घर वैसा नहीं रहा...

"माँ, तुम्हारी मृत्यु को आज लगभग एक वर्ष बीत चुका है। समय सचमुच किसी का इंतज़ार नहीं करता। देखते ही देखते एक पूरा साल बीत गया, और इसी बीच मेरी उम्र भी एक वर्ष बढ़ गई। अब मैं 44 वर्ष का हो गया हूँ।"

माँ,

कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है। शायद यह बात हर किसी के लिए सच हो, लेकिन मेरे लिए नहीं। तुम्हारे जाने के बाद समय आगे तो बढ़ता रहा, पर मन वहीं ठहर गया, जहाँ तुम्हारी अंतिम विदाई हुई थी।

आज भी इस बड़े पैतृक घर के आँगन में चलता हूँ, तो लगता है जैसे तुम किसी कमरे से आवाज़ देकर बुला लोगी। बरामदे की दीवारें, आँगन की मिट्टी, दरवाज़े की चौखट—सब कुछ वैसा ही है, लेकिन इस घर की आत्मा जैसे तुम्हारे साथ ही चली गई।

तुम्हारे जाने के केवल एक महीने बाद ही मैंने रिश्तों का एक ऐसा रूप देखा, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी।

जिस बकरी को तुमने अपने हाथों से पाला था, जिसे तुम परिवार का हिस्सा मानती थीं, उसके बारे में घर में बात होने लगी कि उसे बेच देना चाहिए। उसे रखने की जिम्मेदारी कोई नहीं लेना चाहता था, लेकिन उसे बेचने के लिए लगभग सभी तैयार थे।

उस दिन मैंने पहली बार महसूस किया कि किसी इंसान के जाने के बाद केवल उसकी जगह खाली नहीं होती, उसके साथ उसकी संवेदनाएँ भी धीरे-धीरे घर से विदा होने लगती हैं।

माँ, मैंने उस बकरी को बेचने नहीं दिया।

मैंने उसे तुम्हारी आख़िरी जीवित निशानी मानकर अपने पास रख लिया।

उसकी देखभाल मैंने और मेरी पत्नी ने मिलकर शुरू की। समय पर चारा, पानी, ग्वाली और हर ज़रूरत का ध्यान रखा। उसे संभालते हुए कई बार ऐसा लगता था जैसे मैं तुम्हारी किसी अमानत की रक्षा कर रहा हूँ।

लेकिन धीरे-धीरे मैंने एक और बदलाव देखा।

शायद बकरी किसी को बुरी नहीं लगती थी...

शायद उसे इसलिए बुरा कहा जाने लगा क्योंकि वह मेरे पास थी।

घर के कुछ लोगों के व्यवहार में बदलाव साफ़ दिखाई देने लगा। मुझे महसूस होने लगा कि अब बात केवल एक बकरी की नहीं रही थी। रिश्तों के भीतर कुछ और भी बदल रहा था।

शुरू-शुरू में यह सब देखकर मन बहुत दुखी होता था। कई बार सोचता था कि क्या सचमुच इतना जल्दी सब बदल सकता है?

फिर मैंने एक बात सीख ली—

हर बात का उत्तर शब्दों से नहीं दिया जाता।

कुछ उत्तर समय देता है, और कुछ उत्तर इंसान अपनी खामोशी से देता है।

मैंने भी खामोश रहना सीख लिया।

हम पाँच भाई-बहन अपने-अपने परिवारों और जिम्मेदारियों में व्यस्त हो गए। जीवन सबको आगे ले जा रहा था। लेकिन माँ, तुम्हारी कमी हर दिन पहले जैसी ही महसूस होती रही।

कई बार ऐसा लगता है कि घर में सब कुछ है—दीवारें हैं, कमरे हैं, लोग हैं, रोज़मर्रा की आवाज़ें हैं—लेकिन फिर भी कुछ बहुत बड़ा नहीं है।

वह तुम थीं।

तुम्हारे रहते हुए यह घर केवल ईंटों और छत का ढाँचा नहीं था। यह एक परिवार था।

तुम्हारे जाने के बाद पहली बार मुझे समझ आया कि किसी घर को बड़ा उसके कमरे नहीं बनाते, बल्कि वह एक व्यक्ति बनाता है जो सबको जोड़कर रखता है।

आज भी जब शाम को आँगन में बैठता हूँ और वह बकरी सामने दिखाई देती है, तो ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी कोई याद चुपचाप मेरे पास आकर बैठ गई हो।

उसकी आँखों में मुझे कई बार तुम्हारी ममता दिखाई देती है।

शायद इसलिए आज तक मैं उसे केवल एक पशु नहीं, बल्कि तुम्हारी अंतिम निशानी मानता हूँ।

माँ,

तुम्हारे जाने के बाद मैंने लोगों को बदलते हुए देखा।

लेकिन उसी समय मैंने खुद से एक वादा भी किया—

मैं परिस्थितियों से बदल सकता हूँ, अपने संस्कारों से नहीं।

यही वादा आज भी मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।

क्रमशः... next 




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